कमलेश चतुर्वेदी के सेवानिवृत्त होते ही विकास शाखा में नई पदस्थापना को लेकर उठा संशय, निगम के एमडी की दौड़ भी तेज

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग की सबसे संवेदनशील और प्रभावशाली शाखा “विकास” में आगामी पदस्थापना को लेकर चर्चाओं का दौर तेज हो गया है। 1988 बैच के प्रधान मुख्य वन संरक्षक कमलेश चतुर्वेदी 1 अगस्त को सेवानिवृत्त हो रहे हैं। उनके स्थान पर पीसीसीएफ स्तर के अधिकारी की पदस्थापना की संभावनाओं पर प्रश्नचिन्ह लग गया है, क्योंकि सरकार द्वारा लागू की गई एपीआर (वार्षिक मूल्यांकन रिपोर्ट) की नई प्रक्रिया से यह मामला उलझ गया है।

नए नियमों के अनुसार, CF अथवा CCF स्तर के अधिकारियों की एपीआर अब एपीसीसीएफ (अपर प्रधान मुख्य वन संरक्षक) विकास द्वारा लिखी जाएगी और उसकी समीक्षा पीसीसीएफ वर्किंग प्लान द्वारा की जानी है। ऐसे में यदि चतुर्वेदी के स्थान पर सीधे पीसीसीएफ स्तर के किसी अधिकारी को विकास शाखा का प्रभारी बनाया जाता है, तो एपीआर की नई प्रक्रिया की संरचना ही बाधित हो जाएगी।

इस स्थिति में संभावना जताई जा रही है कि एपीसीसीएफ स्तर के अधिकारी बीएस अन्नागिरी, जो वर्तमान में आईटी प्रभारी हैं, को विकास शाखा की जिम्मेदारी सौंपी जा सकती है। मुख्यालय के वरिष्ठ अधिकारियों का भी मानना है कि अन्नागिरी की कार्यशैली और प्रशासनिक समझ विकास शाखा के लिए उपयुक्त हो सकती है।

इधर, 1990 बैच के विवेक जैन और 1992 बैच के पुरुषोत्तम धीमान दोनों ही पीसीसीएफ स्तर पर हैं और विकास शाखा की कमान के लिए इच्छुक माने जा रहे हैं। परंतु यदि इनमें से किसी एक को पदस्थ किया जाता है, तो पीसीसीएफ वर्किंग प्लान की वर्तमान भूमिका में बदलाव करना पड़ेगा, जो 1993 बैच के मनोज अग्रवाल को हटाकर ही संभव होगा। जबकि मनोज अग्रवाल को हाल ही में इस पद पर नियुक्त किया गया है।

वन विकास निगम के एमडी की कुर्सी भी चर्चा में

वन विकास निगम के प्रबंध संचालक (एमडी) के पद पर भी नियुक्ति की प्रक्रिया शुरू हो गई है। परंपरानुसार, पीसीसीएफ प्रशासन एक में पदस्थ वरिष्ठ अधिकारी को यह जिम्मेदारी सौंपी जाती है। वर्तमान परिप्रेक्ष्य में विवेक जैन, जिनका कार्यकाल मात्र चार माह बचा है, इस पद के लिए उपयुक्त माने जा रहे हैं।

हालांकि, 1992 बैच के पुरुषोत्तम धीमान और उसी बैच की दबंग छवि वाली अधिकारी समिता राजोरा की भी दावेदारी सामने आ रही है। समिता राजोरा को लेकर यह तर्क दिया जा रहा है कि उनमें कार्यों को लेकर तेज़ी और नयापन लाने की ललक है, जो वन विकास निगम जैसे व्यावसायिक संगठन के लिए आवश्यक है।

जैसे-जैसे चतुर्वेदी की सेवानिवृत्ति की तारीख नज़दीक आ रही है, वैसे-वैसे विकास शाखा की कमान किसके हाथ में जाएगी, इसे लेकर जंगल महकमे में बेचैनी बढ़ रही है। क्या सरकार नए एपीआर ढांचे का पालन करते हुए एपीसीसीएफ स्तर के अधिकारी की नियुक्ति करेगी या वरिष्ठता के आधार पर परंपरा को बरकरार रखेगी—यह देखना दिलचस्प होगा।