चंद्रकेतु मिश्रा, प्रयागराज
गंगा और यमुना का संगम, जिसे आस्था और अध्यात्म की राजधानी माना जाता है, इस समय त्रासदी का गवाह बना हुआ है। मानसूनी बारिश और पहाड़ी इलाकों से छोड़े गए पानी के बाद प्रयागराज बाढ़ की चपेट में है। गंगा-यमुना का जलस्तर लगातार बढ़ने से तटवर्ती इलाकों की बस्तियाँ जलमग्न हो चुकी हैं। नैनी, सलोरी, दारागंज, झूंसी और कछार के दर्जनों गाँवों में बाढ़ का पानी घुस चुका है।
संगम नगरी में यह नजारा मानो किसी “जीवंत पीड़ा” की तरह सामने है। गलियों में नावें चल रही हैं, घरों की दीवारें आधी डूब चुकी हैं और लोग छतों या ऊँचे मकानों पर शरण लिए बैठे हैं। महिलाएँ बच्चों को गोद में लिए सुरक्षित स्थान तलाश रही हैं तो बुजुर्ग अपने घरों को डूबते देख बेबस खामोश खड़े हैं।
जिंदगी की जंग: मानवीय पीड़ा का चेहरा
बाढ़ प्रभावित इलाकों में रोजमर्रा की जिंदगी थम गई है। घरों में रखा सामान पानी में बह गया है। जिन घरों में अभी तक पानी नहीं घुसा, वहाँ भी चूल्हा जलाना मुश्किल है क्योंकि गीला ईंधन और खत्म हो चुके राशन ने रसोई की आग बुझा दी है।
बच्चे भूख से बिलख रहे हैं। संक्रामक रोग फैलने का खतरा मंडरा रहा है क्योंकि नालियों का गंदा पानी और बाढ़ का मटमैला पानी एक साथ मिलकर बदबू फैला रहा है। अस्पताल तक पहुँचने के रास्ते बंद हो चुके हैं। गर्भवती महिलाएँ और गंभीर मरीज इलाज के इंतजार में जिंदगी और मौत के बीच जूझ रहे हैं।
छोटे दुकानदारों की दुकानें डूब गईं, मज़दूर काम पर नहीं जा पा रहे और किसान खेतों तक पहुँच नहीं पा रहे। उनकी फसलें भी जलमग्न हो गई हैं। बाढ़ सिर्फ पानी का संकट नहीं, बल्कि रोज़गार और जीवन की डोर तोड़ने वाली त्रासदी बन चुकी है।
राहत और बचाव: प्रशासन की जद्दोजहद
जिलाधिकारी के निर्देश पर राहत कार्य तेज कर दिए गए हैं। एनडीआरएफ और एसडीआरएफ की टीमें नावों से लोगों को सुरक्षित निकाल रही हैं। कई इलाकों में अस्थायी राहत शिविर बनाए गए हैं, जहाँ पीड़ित परिवारों को शरण दी जा रही है।
राशन, पीने का पानी और दवाइयाँ भी वितरित की जा रही हैं। बच्चों को दूध पाउडर और बिस्किट पहुँचाए जा रहे हैं। परंतु संकट की गहराई इतनी ज्यादा है कि मदद हर परिवार तक पर्याप्त रूप में नहीं पहुँच पा रही।
प्रशासन ने लोगों से अपील की है कि वे बाढ़ग्रस्त क्षेत्रों में न रुकें और सुरक्षित स्थानों पर चले जाएँ। साथ ही, स्वास्थ्य विभाग ने चिकित्सा शिविर भी लगाए हैं ताकि संक्रामक बीमारियों को फैलने से रोका जा सके।
संकट से उपजे सवाल: कछार में बस्तियों का खतरा
हर साल प्रयागराज बाढ़ की त्रासदी झेलता है, लेकिन इस बार पानी की मार उन इलाकों पर ज्यादा है जहाँ पिछले कुछ वर्षों में कछार के भीतर अवैध बस्तियाँ बस गई हैं। ये इलाके गंगा-यमुना की धारा के बिल्कुल किनारे हैं, जहाँ बाढ़ का खतरा हमेशा बना रहता है।
विशेषज्ञों का मानना है कि कछार में बढ़ती आबादी इस आपदा को और भयावह बना रही है। लोग सस्ते में जमीन लेकर घर बना लेते हैं, लेकिन बाढ़ आते ही सबसे पहले वही घर डूबते हैं। प्रशासन की चेतावनियों के बावजूद यह सिलसिला नहीं रुका।
जिलाधिकारी ने सख्त लहजे में कहा है कि कछार में अवैध बस्तियों को हटाने की कार्यवाही होगी। लोगों को सुरक्षित स्थानों पर पुनर्वासित किया जाएगा ताकि हर साल की इस त्रासदी से बचा जा सके। उन्होंने चेताया कि अगर लोग चेतावनी के बावजूद कछार में रहेंगे, तो किसी भी जान-माल के नुकसान की जिम्मेदारी उनकी खुद की होगी।
बाढ़ के बीच मानवता की मिसाल
त्रासदी के बीच मानवता की कहानियाँ भी सामने आ रही हैं। कई सामाजिक संगठनों ने राहत सामग्री पहुँचाने का बीड़ा उठाया है। युवा स्वयंसेवक नाव से बाढ़ग्रस्त मोहल्लों तक राशन पहुँचा रहे हैं। डॉक्टरों की टीमें बिना रुके दिन-रात शिविरों में मरीजों की सेवा कर रही हैं।
कुछ लोग अपने घरों के ऊपरी हिस्से को पड़ोसियों को रहने के लिए दे रहे हैं। कहीं बच्चे अपने छोटे भाई-बहनों को कंधों पर उठाए सुरक्षित स्थानों तक ले जा रहे हैं। इस त्रासदी ने लोगों के भीतर छिपी इंसानियत को भी उजागर किया है।
एक चेतावनी, जो अनसुनी नहीं होनी चाहिए
प्रयागराज की बाढ़ हमें यह सोचने पर मजबूर करती है कि यह सिर्फ प्राकृतिक आपदा नहीं, बल्कि मानवीय लापरवाही का भी नतीजा है। अगर कछार में अनियंत्रित तरीके से बस्तियाँ बसती रहीं और जलनिकासी की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में स्थिति और भयावह हो सकती है।
विशेषज्ञों का कहना है कि हमें अब नदी तटों की सुरक्षा और शहरी नियोजन को गंभीरता से लेना होगा। प्रशासन की चेतावनियों को अनसुना करना केवल एक और त्रासदी को न्योता देना होगा।
प्रयागराज की बाढ़ ने हजारों परिवारों को बेघर कर दिया है। उनकी आँखों में असुरक्षा का डर और दिल में अपने घर उजड़ने का दर्द साफ दिखता है। प्रशासन राहत और बचाव में जुटा है, लेकिन यह आपदा हमें एक बड़ा सबक देती है—नदी तटों से छेड़छाड़ और अवैध बस्तियों की अनदेखी अब और बर्दाश्त नहीं की जा सकती।

