गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के वन विभाग में एक और गंभीर अनियमितता का मामला सामने आया है। धार वन मंडल के सरदारपुर में पदस्थ एसडीओ संतोष कुमार रनशोरे को भारतीय वन सेवा (आईएफएस) में पदोन्नत करने की प्रक्रिया पर अब सवाल उठने लगे हैं। आरोप है कि विभाग ने यूपीएससी (संघ लोक सेवा आयोग) के समक्ष रनशोरे से जुड़ी कई महत्वपूर्ण जानकारियां — जिनमें वित्तीय गड़बड़ी, दोषसिद्धि और ₹56,000 की वसूली शामिल है — जाहिर नहीं कीं। इसके परिणामस्वरूप डीपीसी (विभागीय पदोन्नति समिति) ने रनशोरे के नाम को “योग्य” मानते हुए उन्हें आईएफएस पद पर क्लीयरेंस दे दिया।
अब इस मामले की शिकायत सीधे यूपीएससी और वन विभाग के उच्च अधिकारियों से की जा रही है, जिससे डीपीसी की निष्पक्षता और पारदर्शिता पर सवाल खड़े हो गए हैं।
कैसे छिपाई गई जानकारी
वन विभाग ने यूपीएससी को यह नहीं बताया कि संतोष कुमार रनशोरे पर वनीकरण क्षतिपूर्ति योजना में वित्तीय गड़बड़ी का मामला चल रहा है।
जांच में रनशोरे को दोषी पाया गया था और उन पर ₹56,000 की वसूली भी की गई थी। लेकिन यह जानकारी डीपीसी के दौरान प्रस्तुत नहीं की गई। इस चूक या जानबूझी गई लापरवाही के कारण आयोग ने रनशोरे के नाम पर बिना आपत्ति के मंजूरी दे दी।
तेजी से पूरी की गई जांच ने बढ़ाए संदेह
सूत्रों के अनुसार, रनशोरे के मामले में इंदौर सर्कल के मुख्य वन संरक्षक (सीएफ) ने अपने अधिकार क्षेत्र से परे जाकर आरोपपत्र जारी किया और अत्यंत कम समय में जांच पूरी कर रिकवरी आदेश जारी कर दिया।
जबकि सामान्य प्रक्रिया के तहत किसी भी विभागीय जांच को पूरा करने में 2 से 3 वर्ष तक का समय लगता है।
वन विभाग में कई मामलों की जांच वर्षों से लंबित है, ऐसे में रनशोरे का मामला इतने कम समय में निपटाना पक्षपात या दबाव का संकेत माना जा रहा है।
डीपीसी पर सवाल, दोहरे मापदंड के आरोप
9 अक्टूबर को हुई डीपीसी में जिन 23 एसडीओ को आईएफएस के लिए हरी झंडी दी गई, उनमें संतोष कुमार रनशोरे का नाम भी शामिल है।
लेकिन इसी प्रकार के एक अन्य मामले में रामकुमार अवधिया को पदोन्नति सूची से बाहर रखा गया है।
यह विरोधाभास विभागीय प्रक्रिया में दोहरे मापदंड की ओर इशारा करता है।
क्या है रनशोरे के खिलाफ मामला
रनशोरे पर वन विभाग के नियम 14, सिविल सेवा (वर्गीकरण, नियंत्रण एवं अपील) नियम 1966 के तहत आरोप अधिरोपित किए गए हैं।
उन पर यह आरोप है कि उन्होंने सरदारपुर उपवनमंडल में पदस्थ रहते हुए शासन के निर्देशों की अवहेलना की और शासकीय कार्यों में लापरवाही बरती।
डही सूक्ष्म सिंचाई परियोजना (पाइपलाइन) से प्रभावित 38.455 हेक्टेयर वनभूमि के बदले क्षतिपूर्ति वनीकरण योजना के अंतर्गत लगभग 54.733 हेक्टेयर गैर-वनभूमि पर पौधारोपण कराया गया था।
जांच में पाई गई मुख्य त्रुटियां:
- पौधा परिवहन और रोपण कार्य में गंभीर लापरवाही
- सर बोझ परिवहन कार्य में अनियमितता
- प्रथम निदाई कार्य में लापरवाही
- कंटूर बीज बुआई और वर्मी कम्पोस्ट खाद परिवहन में अनियमितता
- वित्तीय गड़बड़ी से सरकारी राशि का नुकसान
इन सभी कमियों को विभागीय जांच रिपोर्ट में दर्ज किया गया था, जिसके आधार पर रनशोरे से ₹56,000 की वसूली के आदेश भी जारी किए गए।
अब क्या हो सकता है आगे
मामले की जानकारी सामने आने के बाद कई वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी संगठन यूपीएससी में शिकायत दर्ज कराने की तैयारी में हैं।
सवाल यह भी उठ रहा है कि जब विभाग के पास दोषसिद्धि और वसूली का रिकॉर्ड था, तो इसे यूपीएससी के समक्ष क्यों छिपाया गया?
इस मामले की स्वतंत्र जांच की मांग उठाई जा रही है।
संगठन में बढ़ी बेचैनी
वन विभाग के अधिकारी इस पूरे घटनाक्रम को लेकर असंतोष जता रहे हैं। उनका कहना है कि एक ओर वर्षों से लंबित जांचों वाले अधिकारियों की फाइलें ठंडी पड़ी हैं, वहीं दूसरी ओर दागदार अधिकारी को ‘योग्य’ बताकर आईएफएस पद की मंजूरी दिला दी गई। यह स्थिति विभाग में कार्यरत ईमानदार अधिकारियों और कर्मचारियों के मनोबल पर असर डाल सकती है।
