Security of the forest or of the officers

वनों की अवैध कटाई बढ़ी, वन्यजीव सुरक्षा पर संकट — आदेश जारी हुए पर पालन नहीं

गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश में वन विभाग की व्यवस्था पर बड़ा सवाल उठ रहा है। वनों की सुरक्षा के लिए तैनात हजारों वनरक्षक (बीट गार्ड) जंगलों की बजाए अफसरों के बंगलों और सरकारी दफ्तरों में तैनात हैं। इससे न केवल वनों की अवैध कटाई बढ़ रही है, बल्कि वन्यजीवों की सुरक्षा और संरक्षण पर भी गंभीर असर पड़ रहा है।

नर्मदा वन मंडल के इटारसी रेंज के छीपीखापा बीट में करीब दो करोड़ रुपये की “गोल्डन सागौन” की अवैध कटाई इस गड़बड़ी का ताजा उदाहरण है।

12,500 वनरक्षक, पर जंगलों में कमी

मध्यप्रदेश में लगभग 12,500 बीट गार्ड पदस्थ हैं, जिन्हें वन सीमाओं और नाकों पर गश्त व सुरक्षा का दायित्व दिया गया है।
लेकिन विभागीय सूत्रों के अनुसार, करीब 3,000 से अधिक वनरक्षक वर्तमान में आईएफएस अधिकारियों, रेंजरों और वन विभाग के उच्च पदस्थ अफसरों के बंगलों पर तैनात हैं।
कई को तो वर्षों से अफसरों के निजी उपयोग में लगाया गया है।

एक वरिष्ठ अधिकारी के मुताबिक, “कई बीट गार्ड दफ्तरों में बाबू बनकर काम कर रहे हैं, जबकि उनकी पोस्टिंग जंगल में होनी चाहिए। इससे जमीनी निगरानी पूरी तरह कमजोर हो चुकी है।”

पत्र जारी, लेकिन कार्रवाई शून्य

वन विभाग के अपर प्रधान मुख्य वनसंरक्षक (प्रशासन–2) की ओर से हाल ही में सभी सीसीएफ और डीएफओ को पत्र जारी कर स्पष्ट निर्देश दिए गए थे —

“वन रक्षकों को तत्काल उनके मूल कार्य यानी वन क्षेत्र सुरक्षा में लगाया जाए, उन्हें किसी भी परिस्थिति में दफ्तर या बंगले पर न रखा जाए।”

लेकिन जानकारों के अनुसार, इन निर्देशों का कहीं भी पालन नहीं हुआ
कई डीएफओ और वरिष्ठ अधिकारियों ने न तो अपने स्तर पर आदेश जारी किए और न ही उल्लंघन करने वालों से कोई जवाब मांगा।

बंगलों पर बनी ‘चकरी संस्कृति’

राज्य के अधिकांश जिलों में पीसीसीएफ, एपीसीसीएफ, सीसीएफ और डीएफओ स्तर के अधिकारियों के बंगलों पर तीन से चार वनकर्मी स्थायी रूप से तैनात हैं।
कई मामलों में ये तैनाती 10 से 12 वर्षों से चल रही है।
विदिशा जिले का एक स्थाई कर्मचारी पिछले 10 वर्षों से एक पीसीसीएफ के बंगले पर ड्यूटी दे रहा है — जबकि संबंधित अधिकारी कई जिलों में तबादले झेल चुके हैं।

विभागीय सूत्र बताते हैं कि “बंगले पर वनरक्षक तैनात होना अब ‘स्टेटस सिंबल’ बन गया है। वरिष्ठ अफसर अपने प्रभाव से ऐसे कर्मचारियों को वर्षों तक नहीं हटने देते।”

बीट गार्ड और सिक्यूरिटी एजेंसी — दोनों पर खर्च

भोपाल स्थित वन भवन की सुरक्षा के लिए पहले से ही निजी सुरक्षा एजेंसी तैनात है।
इसके बावजूद भवन में तीन से चार बीट गार्ड भी सुरक्षा ड्यूटी पर लगे हुए हैं।
इस दोहरी व्यवस्था पर सवाल उठ रहे हैं —

“जब निजी एजेंसी सुरक्षा का काम कर रही है, तो बीट गार्ड की ड्यूटी पर सरकारी संसाधन क्यों खर्च हो रहे हैं?”

जंगल असुरक्षित, वन्यजीव संकट में

जंगलों में गश्त घटने से अवैध कटाई और शिकार की घटनाएँ बढ़ी हैं।
वन्यजीव संरक्षण से जुड़े विशेषज्ञों का कहना है कि

“जंगल छोड़कर कर्मचारी शहरों में अफसरों की सेवा कर रहे हैं, ऐसे में जंगलों की सुरक्षा कौन करेगा?”

प्रदेश के कई वन क्षेत्रों में पिछले एक साल में अवैध कटाई के 150 से अधिक प्रकरण दर्ज किए गए हैं।

प्रशासन मौन, व्यवस्था में जड़ता

भले ही विभागीय स्तर पर कई बार समीक्षा बैठकें हुई हों, पर अमल के स्तर पर कोई ठोस कार्रवाई नहीं दिखती।
मुख्यालय से लेकर रेंज तक अफसर और कर्मचारी एक-दूसरे पर जिम्मेदारी डाल रहे हैं।

भोपाल सहित कई जिलों में अब यह स्थिति बन चुकी है कि “जंगल में पेड़ कट रहे हैं और बीट गार्ड बंगले में चाय परोस रहे हैं।”

वन विभाग का यह ढीला रवैया न केवल वनों के अस्तित्व के लिए खतरा है, बल्कि विभाग की साख पर भी सवाल खड़े कर रहा है।
अगर बीट गार्डों को वापस जंगलों में नहीं भेजा गया, तो आने वाले वर्षों में मध्यप्रदेश की ग्रीन बेल्ट और वन्यजीव संरचना पर गहरा असर पड़ सकता है।