पीसीसीएफ अग्रवाल के निर्देश को पीसीसीएफ कैम्पा ने किया खारिज, वन सुरक्षा से जुड़ा आदेश बना विभागीय विवाद का कारण
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के वन विभाग में किराए के गश्ती वाहनों को लेकर शुरू हुआ प्रशासनिक असंतुलन अब विभागीय विवाद में बदलता जा रहा है। हाल ही में पीसीसीएफ (संरक्षण शाखा) मनोज अग्रवाल द्वारा जारी आदेश में 31 मई 2025 के बाद वन परिक्षेत्र अधिकारियों को किराए के वाहन लेने पर रोक लगाई गई थी, जिसे कैम्पा मद में बजट स्वीकृति के अभाव का हवाला देकर जारी किया गया था। लेकिन इस आदेश पर पीसीसीएफ (कैम्पा) एचयू खान ने सार्वजनिक रूप से असहमति जताते हुए स्पष्ट किया है कि रेंजरों को किराए के वाहन पूर्ववत् मिलते रहेंगे। बता दे इस खबर को indianbreakingnews.com ने प्रमुखता से उठाया था।
कौन क्या बोले:
🔹 मनोज अग्रवाल (पीसीसीएफ संरक्षण): “राष्ट्रीय कैम्पा द्वारा किराए पर वाहन बजट की स्वीकृति नहीं दी गई है, इसलिए प्रतिबंध लगाया गया।”
🔹 एचयू खान (पीसीसीएफ कैम्पा): “रेंज अधिकारियों को वाहन मिलते रहेंगे, बजट की स्वीकृति APO कैम्पा द्वारा की जाएगी।”
रेंजर कैडर का आरोप – आदेश बनाम ज़मीनी सच्चाई
एसोसिएशन ने कहा कि यह आदेश रेंजरों पर अनावश्यक दबाव बनाने जैसा है। एक ओर वे सीमित संसाधनों में जंगलों की सुरक्षा की जिम्मेदारी निभा रहे हैं, वहीं उच्च अधिकारी कार्यालयों से निर्देश देकर उनकी कार्यशैली में बाधा पहुंचा रहे हैं।
कैम्पा फंड की विडंबना
👉 कैम्पा फंड से वाहन बजट पर रोक
👉 परंतु फाइव स्टार होटलों में कार्यशालाओं पर करोड़ों की मंजूरी
👉 समीक्षा बैठकों के नाम पर पर्यटन स्थलों पर आयोजन
👉 अफसरों को परिवार सहित रुकवाया गया, रात्रिभोज और उपहार भी
विवाद की जड़ में नीतिगत असंतुलन
सूत्रों के अनुसार, वन विभाग में दो वरिष्ठ अधिकारियों के परस्पर विरोधी निर्देशों से विभागीय अमले में भ्रम की स्थिति बन गई है। अधिकारी आदेशों को लेकर असमंजस में हैं कि किसका पालन किया जाए। कैम्पा मद को लेकर जारी अस्पष्टता और विरोधाभासी रुख ने वन सुरक्षा से जुड़ी प्राथमिकताओं पर सवाल खड़े कर दिए हैं।
बैठकें या मनोरंजन?
विभाग के कुछ अधिकारी खुलकर कह रहे हैं कि रेंज स्तर पर गश्ती के लिए बजट की कमी बताई जाती है, लेकिन जब बात उच्च अधिकारियों की बैठकों की आती है तो करोड़ों की मंजूरी सहज ही मिल जाती है। बीते महीनों में जबलपुर, इंदौर, ओरछा और बांधवगढ़ जैसे पर्यटन स्थलों पर आयोजित कार्यशालाओं में न केवल महंगे होटल बुक किए गए, बल्कि कार्यक्रमों में रात्रिभोज, मनोरंजन और उपहार वितरण जैसी गतिविधियां भी हुईं।
सवालों में फंसी प्राथमिकताएं
यदि वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग के ज़रिये समीक्षा बैठकें हो सकती हैं, तो पर्यटन स्थलों पर भव्य आयोजन का औचित्य क्या है? क्या इन खर्चों को वन सुरक्षा के लिए नियोजित नहीं किया जाना चाहिए था?
वन विभाग में आदेशों की टकराहट और नीतिगत प्राथमिकताओं की उलझन ने न केवल विभाग की साख पर सवाल खड़े किए हैं, बल्कि फील्ड अमले के मनोबल को भी प्रभावित किया है। रेंजर कैडर की पुरानी मांगें आज भी अनसुनी हैं और अब संसाधनों की कटौती ने उनकी कार्यक्षमता पर सीधा प्रहार किया है। यह स्थिति विभाग के लिए गंभीर और जंगलों के लिए खतरनाक साबित हो सकती है।
