वन भवन भोपाल मप्र

एक ही प्रकरण में दो सक्षम अधिकारियों के अलग-अलग निष्कर्ष से प्रक्रिया पर उठे सवाल

गणेश पाण्डेय, भोपाल। वन अपराध प्रकरण क्रमांक 235/16, दिनांक 28 जनवरी 2024 में जब्त जेसीबी मशीन क्रमांक MP-36-H-0872 को लेकर वन विभाग के दो सक्षम अधिकारियों द्वारा पारित आदेशों में सामने आया अंतर अब चर्चा का विषय बन गया है। प्राधिकृत अधिकारी एवं उप वनमंडल अधिकारी, टीकमगढ़ ने जहां इस मशीन को राजसात करने का आदेश दिया था, वहीं अपीलीय अधिकारी एवं वन संरक्षक, छतरपुर ने उसी आदेश को निरस्त करते हुए जेसीबी को राजसात से मुक्त कर दिया। एक ही प्रकरण में राजसात और निर्मुक्ति के दो अलग-अलग निष्कर्ष सामने आने के बाद अब सवाल उठ रहा है कि दोनों स्तरों पर उपलब्ध रिकॉर्ड, जब्ती पंचनामा, अभियोजन साक्ष्य और वाहन की कथित पूर्व संलिप्तता का परीक्षण किस आधार पर किया गया।

प्राधिकृत अधिकारी ने किया था जेसीबी का राजसात

उपलब्ध आदेश की जानकारी के अनुसार, वन अपराध प्रकरण क्रमांक 235/16 में प्राधिकृत अधिकारी एवं उप वनमंडल अधिकारी, टीकमगढ़ ने आदेश क्रमांक 05/08/24 के माध्यम से जेसीबी मशीन क्रमांक MP-36-H-0872 को राजसात करने का निर्णय लिया। बताया गया कि मशीन वन अपराध में लगातार दूसरी बार संलिप्त पाई गई थी। राजसात का निर्णय प्रकरण में उपलब्ध साक्ष्यों, आरोपी/वाहन मालिक की भूमिका और अभियोजन से जुड़े रिकॉर्ड के परीक्षण के बाद लिया गया था।

वन अपराध में प्रयुक्त वाहन अथवा मशीन के खिलाफ राजसात की कार्रवाई का उद्देश्य वन अपराध में इस्तेमाल संसाधनों पर कानूनी कार्रवाई करना होता है। ऐसे में किसी वाहन को राजसात करने या उससे मुक्त करने के लिए प्रकरण के दस्तावेज और उपलब्ध साक्ष्यों का परीक्षण महत्वपूर्ण माना जाता है।

अपील में बदल गया पूरा निष्कर्ष

प्राधिकृत अधिकारी के आदेश के खिलाफ अपील की गई। इसके बाद अपीलीय अधिकारी एवं वन संरक्षक, छतरपुर ने मामले की सुनवाई करते हुए प्राधिकृत अधिकारी के राजसात संबंधी आदेश को निरस्त कर दिया। इसके साथ ही जेसीबी को राजसात से मुक्त करते हुए निर्मुक्त करने का आदेश दिया गया।

यहीं से पूरे मामले में सबसे बड़ा सवाल खड़ा होता है। जब निचले स्तर पर उपलब्ध रिकॉर्ड के आधार पर मशीन राजसात योग्य मानी गई, तो अपीलीय स्तर पर ऐसा कौन-सा आधार सामने आया जिसके चलते वही मशीन राजसात से मुक्त कर दी गई?

यह अंतर अपने आप में किसी अधिकारी को दोषी साबित नहीं करता, क्योंकि अपीलीय अधिकारी को रिकॉर्ड और कानून के आधार पर पूर्व आदेश को बदलने का अधिकार हो सकता है। लेकिन दोनों आदेशों में निष्कर्ष अलग होने के कारण उनके आधार और तर्कों की तुलना महत्वपूर्ण हो जाती है।

दूसरी बार वन अपराध में संलिप्तता भी जांच के केंद्र में

मामले में एक महत्वपूर्ण तथ्य यह बताया गया है कि जेसीबी मशीन के वन अपराध में दूसरी बार संलिप्त पाए जाने को राजसात के निर्णय में आधार बनाया गया था। ऐसे में यह जानना महत्वपूर्ण है कि पूर्व वन अपराध से संबंधित रिकॉर्ड क्या था और अपीलीय स्तर पर उस रिकॉर्ड का किस तरह परीक्षण किया गया।

यदि पूर्व अपराध का रिकॉर्ड प्रकरण में मौजूद था, तो यह सवाल स्वाभाविक रूप से उठता है कि अपील के दौरान उसकी प्रासंगिकता को किस आधार पर स्वीकार अथवा अस्वीकार किया गया। दूसरी ओर, यदि पूर्व संलिप्तता से संबंधित रिकॉर्ड में कोई कानूनी या तथ्यात्मक कमी थी, तो उसे अपीलीय आदेश में किस तरह दर्ज किया गया—यह भी महत्वपूर्ण है।

सवाल राजसात की गाइडलाइन के पालन का

शिकायतकर्ता पक्ष का कहना है कि दोनों आदेशों को सामने रखकर यह जांच जरूरी है कि राजसात की निर्धारित प्रक्रिया और संबंधित दिशा-निर्देशों का पालन किस स्तर पर हुआ। हालांकि, केवल दो अलग-अलग आदेश होने से प्रक्रिया में अनियमितता स्वतः सिद्ध नहीं होती। इसके लिए दोनों आदेशों के कारण, प्रकरण की मूल केस डायरी, जब्ती दस्तावेज, अभियोजन साक्ष्य और संबंधित नियमों का तुलनात्मक परीक्षण जरूरी होगा।

इसी वजह से पूरे मामले में अब मुख्य सवाल आदेश के सही या गलत होने से ज्यादा निर्णय लेने की प्रक्रिया और उसके दस्तावेजी आधार को लेकर है।

इन सवालों के जवाब जरूरी

  • प्राधिकृत अधिकारी ने जेसीबी राजसात करने का फैसला किन दस्तावेजों और साक्ष्यों के आधार पर लिया?
  • क्या राजसात संबंधी निर्धारित प्रक्रिया का पूरा पालन किया गया?
  • अपीलीय अधिकारी ने राजसात का आदेश किन ठोस आधारों पर निरस्त किया?
  • मशीन की कथित दूसरी बार वन अपराध में संलिप्तता के रिकॉर्ड का अपील में किस तरह परीक्षण हुआ?
  • जब्ती पंचनामा और अभियोजन से जुड़े दस्तावेजों का दोनों स्तरों पर कितना परीक्षण किया गया?
  • क्या दोनों अधिकारियों ने समान तथ्यों की अलग-अलग व्याख्या की?
  • यदि निष्कर्ष अलग थे, तो दोनों आदेशों में इसके कारण स्पष्ट रूप से दर्ज किए गए हैं या नहीं?

पहले भी हो चुकी है शिकायत

बताया गया है कि इस मामले में पूर्व में भी शिकायत की जा चुकी है और मुख्यालय स्तर पर उसका निराकरण किया गया था। ऐसे में अब सामने आए दोनों आदेशों के बीच के अंतर को लेकर दोबारा सवाल उठ रहे हैं। यदि शिकायतकर्ता के पास ऐसे नए दस्तावेज या तथ्य हैं, जो पूर्व परीक्षण के समय रिकॉर्ड पर नहीं थे, तो उनके आधार पर मामले की दोबारा समीक्षा की आवश्यकता पर निर्णय संबंधित सक्षम प्राधिकारी ही कर सकता है।

एक और मामले से भी जोड़ा जा रहा प्रकरण

इस मामले को वन अपराध प्रकरण क्रमांक 405/08, दिनांक 14 मार्च 2024 से भी जोड़े जाने की बात सामने आई है। हालांकि, इस दूसरे प्रकरण के संबंध में उपलब्ध दस्तावेजों और तारीखों का स्वतंत्र सत्यापन आवश्यक है। इसलिए दोनों मामलों को एक-दूसरे से सीधे जोड़कर किसी निष्कर्ष पर पहुंचना फिलहाल उचित नहीं होगा।

पुलिस के सहयोग से जब्ती का भी उल्लेख

मामले से जुड़े विवरण में वाहनों और मशीनों की जब्ती में पुलिस के सहयोग का भी उल्लेख किया गया है। ऐसे में जब्ती की परिस्थितियां, मौके पर तैयार किए गए दस्तावेज, वन अपराध की प्रकृति और मशीन की भूमिका का रिकॉर्ड विशेष महत्व रखता है। यदि इन सभी दस्तावेजों का दोनों स्तरों पर परीक्षण हुआ है, तो अलग-अलग निष्कर्ष के पीछे दर्ज कारण ही पूरे मामले की स्थिति स्पष्ट कर सकते हैं।

अब समीक्षा से ही साफ होगी तस्वीर

जेसीबी का राजसात होना या अपील में उससे मुक्त होना अपने आप में अंतिम रूप से किसी अधिकारी की गलती साबित नहीं करता। असली सवाल यह है कि दोनों आदेश किन तथ्यों, साक्ष्यों और नियमों के आधार पर पारित हुए। यदि दोनों आदेशों में विरोधाभास है तो मूल प्रकरण रिकॉर्ड, जब्ती पंचनामा, पूर्व अपराध का विवरण, अभियोजन साक्ष्य और लागू राजसात प्रावधानों की निष्पक्ष समीक्षा से ही स्थिति स्पष्ट हो सकती है।

फिलहाल मामला इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि एक ही जेसीबी के संबंध में पहले राजसात और बाद में निर्मुक्ति के आदेश सामने आए हैं। अब निगाह वन विभाग के वरिष्ठ अधिकारियों और शासन पर है कि क्या इस विरोधाभास को केवल अपीलीय प्रक्रिया का हिस्सा मानकर प्रकरण समाप्त माना जाएगा या उपलब्ध दस्तावेजों और प्रक्रिया की स्वतंत्र समीक्षा कराई जाएगी।