वनभूमि से जुड़े मामलों के निराकरण के लिए DFO की व्यक्तिगत मौजूदगी अनिवार्य
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश वन विभाग में वनमंडलाधिकारियों (DFO) की जिला प्रशासन के साथ भूमिका को लेकर नया प्रशासनिक निर्देश चर्चा में है। प्रमुख सचिव वन राघवेंद्र कुमार सिंह के निर्देश के मुताबिक सामान्य वनमंडल के DFO को कलेक्टर की समय-सीमा (TL) बैठक में स्वयं उपस्थित होना होगा। उनकी जगह किसी अधीनस्थ अधिकारी या कर्मचारी को प्रतिनिधि के रूप में भेजना स्वीकार नहीं किया जाएगा। निर्देश में खास तौर पर उन विकास कार्यों से जुड़े मामलों को प्राथमिकता देने को कहा गया है, जिनमें वनभूमि प्रभावित होती है। ऐसे प्रकरणों में DFO को संबंधित विभाग से तत्काल संपर्क कर निराकरण की कार्रवाई सुनिश्चित करनी होगी। वन विभाग से जुड़े ऐसे मामलों, जिनमें जिला प्रशासन अथवा अन्य विभागों के साथ समन्वय जरूरी है, उनका भी आपसी समन्वय से समाधान कराने के निर्देश दिए गए हैं।
DFO का सवाल—जंगल की सुरक्षा कौन करेगा?
निर्देश के बाद कुछ DFO की ओर से आपत्ति की चर्चा है। उनका तर्क है कि यदि उन्हें नियमित रूप से लंबी TL बैठकों में उपस्थित रहना पड़ेगा तो वन एवं वन्यजीव सुरक्षा, गश्ती और मैदानी निरीक्षण जैसे मूल दायित्व प्रभावित हो सकते हैं। अधिकारियों के एक वर्ग का मानना है कि बैठक में वन विभाग से संबंधित महत्वपूर्ण एजेंडा होने पर DFO को बुलाया जाए, संबंधित विषय पर चर्चा की जाए और उसके बाद उन्हें मैदानी जिम्मेदारियों के लिए रिलीज कर दिया जाए।
DFO अधिकारियों की ओर से बैठक की सीटिंग व्यवस्था और प्रोटोकॉल को लेकर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। उनका कहना है कि DFO वनमंडल का प्रमुख मैदानी अधिकारी है और उसकी प्रशासनिक भूमिका को देखते हुए जिला स्तरीय बैठकों में उसकी स्थिति स्पष्ट होनी चाहिए।
जिला प्रशासन से समन्वय बढ़ाने की कवायद
प्रशासनिक दृष्टि से देखा जाए तो वनभूमि से जुड़े विकास कार्यों में कई बार जिला प्रशासन और वन विभाग के बीच समन्वय की आवश्यकता होती है। सड़क, सिंचाई, खनन, विद्युत, आवास अथवा अन्य विकास परियोजनाओं में वनभूमि प्रभावित होने पर वन विभाग की अनुमति और कार्रवाई जरूरी होती है। ऐसे मामलों में DFO की सीधे मौजूदगी से निर्णय प्रक्रिया तेज होने की संभावना है।
वहीं, वन विभाग के मैदानी अधिकारियों का तर्क है कि DFO का काम केवल कार्यालयीन समन्वय तक सीमित नहीं है। वन अपराधों की रोकथाम, अवैध कटाई और अतिक्रमण पर कार्रवाई, वन्यजीव सुरक्षा, गश्ती तथा अधीनस्थ अमले की निगरानी भी उसकी जिम्मेदारी है। इसलिए बैठकों में लगने वाले समय और मैदानी जिम्मेदारियों के बीच संतुलन जरूरी है।
क्या प्रशासनिक भूमिका भी बदल रही है?
इस निर्देश ने DFO की प्रशासनिक भूमिका को लेकर भी बहस शुरू कर दी है। DFO वनमंडल का प्रमुख अधिकारी होता है और उसके पास बड़े क्षेत्र में वन संरक्षण एवं प्रबंधन की जिम्मेदारी रहती है। ऐसे में कलेक्टर की TL बैठक में व्यक्तिगत उपस्थिति अनिवार्य किए जाने को कुछ अधिकारी जिला स्तर पर जवाबदेही बढ़ाने की कोशिश के रूप में देख रहे हैं।
दूसरी ओर, इसे जिला प्रशासन और वन विभाग के बीच समन्वय मजबूत करने की सामान्य प्रशासनिक व्यवस्था भी माना जा सकता है। फिलहाल निर्देश का घोषित उद्देश्य वनभूमि से प्रभावित विकास कार्यों और दूसरे विभागों से जुड़े मामलों का तेजी से निराकरण करना है।
ACR/CR विवाद से भी जोड़कर देख रहे अधिकारी
वन विभाग के कुछ अधिकारी इस घटनाक्रम को हाल में ACR/CR लिखने के अधिकार से जुड़े विवाद की पृष्ठभूमि में भी देख रहे हैं। हालांकि, DFO की TL बैठक में अनिवार्य उपस्थिति और ACR/CR से जुड़े न्यायिक मामले के बीच प्रत्यक्ष संबंध का कोई आधिकारिक उल्लेख सामने नहीं आया है। इसलिए दोनों विषयों को सीधे जोड़ना फिलहाल उचित नहीं होगा।
सेवानिवृत्त एपीसीसीएफ ने उठाए सवाल
सेवानिवृत्त एपीसीसीएफ आजाद सिंह डबास का कहना है कि DFO वनमंडल का प्रमुख फील्ड अधिकारी है। उनके मुताबिक, अत्यंत महत्वपूर्ण मुद्दा होने पर DFO को बैठक में बुलाकर विषय पर चर्चा की जानी चाहिए और उसके बाद उन्हें मैदानी काम के लिए रिलीज कर देना चाहिए। उन्होंने कहा कि इस निर्देश पर आईएफएस एसोसिएशन को मुख्य सचिव के समक्ष आपत्ति दर्ज करानी चाहिए। डबास ने एसोसिएशन की मौजूदा भूमिका पर भी सवाल उठाते हुए कहा कि संगठन के पदाधिकारी प्राइम पोस्टिंग के फेर में नौकरशाही की परिक्रमा करते हैं और एसोसिएशन लगभग निष्क्रिय हो गया है।
समन्वय जरूरी, लेकिन मैदानी जिम्मेदारी भी अहम
पूरे मामले में मूल सवाल DFO की बैठक में मौजूदगी से ज्यादा जिला प्रशासन और वन विभाग के बीच जिम्मेदारियों के संतुलन का है। वनभूमि से जुड़े मामलों के तेजी से निराकरण के लिए DFO की मौजूदगी उपयोगी हो सकती है, लेकिन यदि हर TL बैठक में लंबी व्यक्तिगत मौजूदगी जरूरी होती है तो वन सुरक्षा और मैदानी निगरानी के लिए उपलब्ध समय प्रभावित होने की आशंका भी है।
इसलिए आने वाले समय में यह देखना महत्वपूर्ण होगा कि निर्देश व्यवहार में किस तरह लागू होता है और क्या वन विभाग तथा जिला प्रशासन ऐसी व्यवस्था बनाते हैं, जिसमें DFO की जवाबदेही भी बनी रहे और जंगल की सुरक्षा से जुड़े उसके मूल मैदानी दायित्व भी प्रभावित न हों।
