अधिकारियों के लिए तय सीमा से महंगे वाहन खरीदे गए, वित्त विभाग के परिपत्र ने खोले घोटाले के दरवाजे
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के वन विभाग में 29 करोड़ रुपये की भारी-भरकम वाहन खरीदी एक बार फिर कटघरे में है। यह मामला तब और गहराता नजर आ रहा है जब वित्त विभाग का नया सर्कुलर सामने आया, जिसमें स्पष्ट किया गया है कि किस स्तर के अधिकारी के लिए कितनी कीमत तक का वाहन खरीदा जा सकता है। मगर वास्तविकता ये है कि कई अफसरों को उनके पद की पात्रता से कहीं अधिक कीमत की लग्जरी गाड़ियां बांटी गई हैं, जिससे खरीदी प्रक्रिया पर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
सूत्रों के मुताबिक 2 मई 2025 को वित्त विभाग द्वारा जारी सर्कुलर के अनुसार, मेट्रिक्स लेवल 14 या उससे ऊपर के अफसरों को अधिकतम 12 लाख तक की वाहन खरीद की अनुमति है, लेकिन वन विभाग में कई अफसरों को 19 लाख रुपये तक की स्कॉर्पियो और 9.73 लाख रुपये की बुलेरो नियो आवंटित की गई हैं। इससे भी बड़ा सवाल ये है कि क्या यह सर्कुलर केवल लीपापोती के लिए लाया गया या फिर यह विभागीय खरीदी से पहले ही प्रभाव में था?
वाहन खरीदी समिति भी संदेह के घेरे में
गौरतलब है कि वाहन खरीद समिति में शामिल अफसरों ने एसीएस और वन बल प्रमुख को भी गलत जानकारी देकर गुमराह किया। वाहन खरीदी को लेकर अभी तक कोई स्पष्ट जवाबदेही तय नहीं की गई है। वहीं, एक वरिष्ठ अधिकारी ने नाम न जाहिर करने की शर्त पर यह सुझाव दिया है कि वन बल प्रमुख यदि स्वयं को इस गड़बड़ी से अलग रखना चाहते हैं, तो उन्हें उच्चस्तरीय जांच समिति गठित करनी चाहिए।
क्या कहते हैं आंकड़े
वन विभाग ने अब तक कुल 214 वाहन खरीदे हैं जिनमें 108 बुलेरो नियो, 27 बुलेरो, 65 स्कॉर्पियो, 10 ट्रक और 4 सियाज कारें शामिल हैं। इनकी कुल लागत करीब 29 करोड़ रुपये आंकी गई है। सबसे अधिक सवाल स्कॉर्पियो और सियाज जैसी लग्जरी गाड़ियों को लेकर उठे हैं, जो वरिष्ठ अधिकारियों को दी गई हैं।
वित्त विभाग के पुराने निर्देशों की भी अवहेलना
वित्त विभाग का यह कोई पहला सर्कुलर नहीं है। वर्ष 2013 में तत्कालीन वित्त सचिव मनीष रस्तोगी के हस्ताक्षर से जारी सर्कुलर में भी गाड़ियों की अधिकतम कीमत निर्धारित की गई थी। इसमें ₹10,000 ग्रेड-पे या HAG वेतनमान वाले अधिकारियों के लिए 7.50 लाख रुपए तक की कीमत का वाहन खरीदने की सीमा तय थी। बावजूद इसके, वन विभाग में इन सीमाओं का खुलेआम उल्लंघन किया गया।

EOW की नजर में मामला
राज्य की आर्थिक अपराध अन्वेषण शाखा (EOW) भी इस पूरे मामले की तह तक पहुंचने की कोशिश कर रही है। उन्होंने वित्त विभाग से खरीदी संबंधित दस्तावेजों की मांग की है, जिससे साफ है कि घोटाले की परतें अभी और खुल सकती हैं।
फील्ड में नाराजगी, व्हाट्सएप ग्रुप में चर्चा गरम
फील्ड लेवल के कई अफसर इस खरीदी से असंतुष्ट हैं। आईएफएस अधिकारियों के व्हाट्सएप ग्रुप में सर्कुलर की कॉपी जमकर वायरल हो रही है और साथ ही खरीदी के औचित्य पर सवाल भी उठाए जा रहे हैं। कई अधिकारियों का कहना है कि पात्रता से अधिक कीमत की गाड़ियों के लिए कैबिनेट की मंजूरी अनिवार्य थी, जो नहीं ली गई।
वित्त विभाग के सर्कुलर ने वन विभाग की वाहन खरीदी पर से पर्दा उठा दिया है। ऐसे में यह स्पष्ट हो गया है कि या तो नियमों की जानबूझकर अनदेखी की गई है या फिर किसी योजना के तहत गड़बड़ी को वैध ठहराने का प्रयास हुआ है। अब देखना यह होगा कि सरकार इस घोटाले पर क्या रुख अपनाती है- दोषियों पर कार्रवाई होती है या मामला फाइलों में दफन कर दिया जाता है।
