वनकर्मियों की सुरक्षा पर फिर उठे सवाल, बढ़ते हमलों से गहराया संकट
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के जंगलों की सुरक्षा करने वाले वनकर्मी खुद असुरक्षित हैं। 77,073 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र की निगरानी करने वाले फ्रंट लाइन फॉरेस्ट स्टाफ को न पर्याप्त सुरक्षा उपकरण मिल रहे हैं, न आधुनिक हथियार और न ही जोखिम के अनुरूप संसाधन। यही कारण है कि अतिक्रमण, अवैध कटाई, खनन और वन माफिया के खिलाफ कार्रवाई के दौरान वनकर्मियों पर हमले लगातार बढ़ रहे हैं। सूत्रों के अनुसार प्रदेश में अतिक्रमण विरोधी कार्रवाई के दौरान हर वर्ष करीब 50 वनकर्मी घायल होते हैं, जबकि औसतन 2 से 3 कर्मचारियों की जान भी चली जाती है।
हाल के महीनों में खंडवा, देवास, भोपाल, शहडोल और मुरैना में वनकर्मियों पर हुए हमलों ने सुरक्षा व्यवस्था पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। खंडवा के आमा खुजरी क्षेत्र में अतिक्रमण हटाने गई टीम पर करीब 150 लोगों ने लाठी, पत्थर और गोफन से हमला कर दिया, जिसमें कई वनरक्षक घायल हुए। देवास के भील आमला में अतिक्रमण हटाने पहुंचे अमले पर पथराव कर वाहनों, जेसीबी और ड्रोन को नुकसान पहुंचाया गया। भोपाल के बैरसिया क्षेत्र में पौधरोपण की भूमि बचाने गए वनकर्मियों पर हथियारों से हमला हुआ, जबकि शहडोल में रेत माफिया और मुरैना में अवैध खनन के खिलाफ कार्रवाई के दौरान भी गंभीर घटनाएं सामने आईं। वनकर्मियों का कहना है कि पुलिस जैसी जिम्मेदारियां निभाने के बावजूद उन्हें पुलिस जैसी कानूनी शक्तियां, सुरक्षा कवच और संसाधन उपलब्ध नहीं हैं।
सुप्रीम कोर्ट के सुझाव के बाद भी ‘फोर्स’ का दर्जा नहीं
वन विभाग के अधिकारियों और कर्मचारी संगठनों का कहना है कि सुप्रीम कोर्ट ने भी वन विभाग को सशक्त सुरक्षा बल के रूप में विकसित करने की आवश्यकता पर सुझाव दिया था, लेकिन अब तक विभाग को पुलिस या अन्य सुरक्षा बलों जैसी संरचना और अधिकार नहीं मिले हैं। वनकर्मियों के पास न पर्याप्त सुरक्षा जैकेट हैं, न आधुनिक हथियार और न ही आत्मरक्षा के प्रभावी कानूनी अधिकार। कर्मचारी संगठनों की मांग है कि वन अपराध रोकने वाली टीमों को विशेष सुरक्षा बल, आधुनिक उपकरण और पुलिस जैसी कानूनी सुरक्षा प्रदान की जाए।
77 हजार वर्ग किलोमीटर जंगल, सुरक्षा के लिए केवल 27 करोड़
प्रदेश के 77,073 वर्ग किलोमीटर वन क्षेत्र और वन्यजीवों की सुरक्षा का दायित्व संरक्षण शाखा के पास है, लेकिन इस पूरी व्यवस्था के लिए मात्र 27 करोड़ रुपये का बजट उपलब्ध है। विभागीय जानकारी के अनुसार मानव संसाधन शाखा को लगभग 43 करोड़ रुपये तथा पर्यावरण वानिकी शाखा को करीब 37 करोड़ रुपये का बजट मिलता है। वन अधिकारियों का मानना है कि फील्ड सुरक्षा के लिए संसाधनों की कमी का सीधा असर वन अपराध नियंत्रण पर पड़ रहा है।
अतिक्रमण और माफिया सबसे बड़ी चुनौती
मध्यप्रदेश देश में वन भूमि पर सबसे अधिक अतिक्रमण वाले राज्यों में शामिल है। उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में करीब 5,347 वर्ग किलोमीटर वन भूमि पर अतिक्रमण दर्ज है, जो अन्य राज्यों की तुलना में सबसे अधिक बताया जाता है। विभागीय सूत्रों के अनुसार बालाघाट, बैतूल, भोपाल, छतरपुर, छिंदवाड़ा, ग्वालियर, नर्मदापुरम, इंदौर, जबलपुर, खंडवा, रीवा, सागर, शहडोल, शिवपुरी और उज्जैन जैसे क्षेत्रों में टिम्बर, खनिज, रेत, शिकार और अतिक्रमण माफिया सक्रिय हैं। वनकर्मियों का आरोप है कि कई मामलों में स्थानीय प्रभावशाली लोगों के संरक्षण के कारण कार्रवाई और अधिक चुनौतीपूर्ण हो जाती है।
हर साल दर्ज होते हैं हजारों वन अपराध
वन विभाग के उपलब्ध आंकड़ों के अनुसार प्रतिवर्ष करीब 30 हमले वन कर्मचारियों पर दर्ज होते हैं, जिनमें औसतन 29 कर्मचारी घायल और 2 से 3 कर्मचारियों की मृत्यु हो जाती है। इसके अलावा हर वर्ष लगभग 2,511 वाहन राजसात किए जाते हैं, जबकि 18 से 19 हजार प्रकरणों में वन उपज जब्त होती है, जिसकी अनुमानित कीमत 45 से 48 करोड़ रुपये के बीच होती है। ये आंकड़े बताते हैं कि वन अपराध के खिलाफ कार्रवाई लगातार जारी है, लेकिन जोखिम भी उसी अनुपात में बढ़ता जा रहा है।
‘तीन अतिरिक्त बटालियन की मांग की है’
संरक्षण शाखा के एपीसीसीएफ अमित दुबे ने बताया कि खंडवा में वनकर्मियों पर हुए हमले की समीक्षा के लिए वह स्वयं दौरे पर जा रहे हैं। उन्होंने कहा कि सरकार से खंडवा और बुरहानपुर के लिए दो अतिरिक्त बटालियन तथा राजगढ़-विदिशा क्षेत्र के लिए एक अलग बटालियन की मांग की गई है, ताकि संवेदनशील क्षेत्रों में वनकर्मियों की सुरक्षा मजबूत की जा सके।
