आरटीआई में खुलासा: कमेटी ने सुझाए थे फोर व्हील ड्राइव वाहन, अफसरों ने खरीदी महंगी टू व्हील ड्राइव; वित्तीय अनियमितताओं से विधानसभा में गरमाएगा मुद्दा

गणेश पाण्डेय, भोपाल। छत्तीसगढ़ के जंगल महकमे में 26 करोड़ रुपए की लागत से की गई 214 वाहनों की खरीदी अब विवादों में घिर गई है। दस्तावेजों के अनुसार वन विभाग के लिए आवश्यक फोर व्हील ड्राइव वाहनों के स्थान पर महंगी टू व्हील ड्राइव स्कॉर्पियो वाहन खरीदी गई। इस पर विपक्षी दलों ने सरकार को घेरना शुरू कर दिया है और आने वाले विधानसभा सत्र में यह मामला जोरशोर से उठाया जाएगा।

RTI में खुलासा: कमेटी की अनुशंसा को नजरअंदाज किया गया

आरटीआई एक्टिविस्ट पुनीत टंडन को प्राप्त दस्तावेजों के अनुसार, पहले क्रय समिति के अध्यक्ष रहे डॉ. दिलीप कुमार ने फोर व्हील ड्राइव (4WD) वाहन खरीदने की सिफारिश की थी। लेकिन उनके रिटायरमेंट के बाद गठित यूके सुबुद्धि और फिर सुदीप सिंह की अध्यक्षता वाली कमेटियों ने न सिर्फ इस सिफारिश को दरकिनार किया, बल्कि अफसरों की सुविधा और निजी हित को प्राथमिकता दी।

सबसे चौंकाने वाला तथ्य यह है कि जिस स्कॉर्पियो-एन 4WD की कीमत 15.84 लाख थी, उसके बदले विभाग ने 18.24 लाख प्रति यूनिट की टू व्हील ड्राइव स्कॉर्पियो खरीदी। सवाल यह उठता है कि जब 4WD सस्ती और ज़रूरी थी, तो फिर 2WD महंगी क्यों खरीदी गई?

जमीन हकीकत से अनजान निर्णय

वन विभाग का काम बीहड़, रेतीले, कच्चे और पहाड़ी क्षेत्रों में होता है जहां 4WD वाहन की जरूरत अनिवार्य होती है। लेकिन खरीदी गई गाड़ियों में न तो पर्याप्त ग्राउंड क्लीयरेंस है, न ही वे ऐसे इलाकों के लिए उपयुक्त हैं। इससे यह स्पष्ट होता है कि वाहन खरीदने से पहले भौगोलिक आवश्यकताओं और कार्य क्षेत्र की सच्चाई को नजरअंदाज किया गया।

मप्र वन विभाग में वाहन घोटाला Ibn न्यूज़

तीन बार बनी क्रय समिति, विशेषज्ञों को रखा गया बाहर

दस्तावेजों से यह भी सामने आया है कि वाहन खरीद प्रक्रिया में पारदर्शिता से अधिक अफसरों की ‘मर्जी’ चली। तीन अलग-अलग समितियों का गठन किया गया, लेकिन किसी में वाहन विशेषज्ञ को शामिल नहीं किया गया। साथ ही, किसी भी कमेटी ने तुलनात्मक दर तालिका (कॉम्पेरेटिव रेट चार्ट) तैयार नहीं की। अंततः एक ही कंपनी—महिंद्रा एंड महिंद्रा—के मॉडल को खरीद आदेश जारी किया गया। यह पूर्वनियोजित चयन का संकेत देता है।

वित्त विभाग के नियमों की अनदेखी

वाहनों की खरीदी में वित्त विभाग के सर्कुलर को भी नजरअंदाज किया गया। नियमानुसार अफसरों के वेतनमान के अनुसार ही वाहन खरीदे जाने चाहिए। यदि स्कॉर्पियो या इनोवा जैसी महंगी गाड़ियाँ खरीदनी थीं, तो उसकी कैबिनेट से मंजूरी आवश्यक थी। परंतु कैबिनेट की स्वीकृति लिए बिना ही इन्हें खरीदा गया, जिससे वित्तीय अनुशासन का उल्लंघन हुआ है।

राइट ऑफ सूची में भी गड़बड़ी

नए वाहनों की खरीदी के लिए जो ‘राइट ऑफ’ सूची बनाई गई, उसमें भी संदेहास्पद बातें सामने आई हैं। सूची में शामिल कई वाहन ऐसे पाए गए, जिनके नंबर परिवहन विभाग की वेबसाइट पर एम्बुलेंस के रूप में दर्ज हैं। एक वाहन का पंजीयन तो इंदौर आरटीओ से है और वह फाइनेंस पर चल रहा है। ऐसे में यह शंका प्रबल हो जाती है कि पुराने वाहनों की संख्या को बढ़ा-चढ़ाकर दिखाया गया, ताकि नए वाहन खरीदने का आधार तैयार किया जा सके।

कांग्रेस विधायक उठाएंगे मामला

विपक्ष ने इस पूरे मामले को विधानसभा के मानसून सत्र में उठाने की तैयारी कर ली है। कांग्रेस विधायक ध्यानाकर्षण प्रस्ताव के जरिए सरकार से जवाब मांगने वाले हैं। पूरे घटनाक्रम से यह स्पष्ट होता जा रहा है कि यह केवल एक खरीदी नहीं, बल्कि सुनियोजित वित्तीय कुप्रबंधन और अफसरशाही के संरक्षण की एक गंभीर मिसाल है।