प्रमुख सचिव के आदेश को ठेंगा दिखाकर भ्रष्टाचार जांच के बावजूद आरोपी प्रोफेसर को दोबारा बनाया प्राचार्य

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उच्च शिक्षा विभाग में आदेशों की अनदेखी, सबूतों को नष्ट करने की जताई जा रही आशंका

गणेश पाण्डेय, भोपाल।
उच्च शिक्षा विभाग में एक चौंकाने वाला मामला सामने आया है, जिसमें भ्रष्टाचार की जांच के बावजूद एक आरोपी प्रोफेसर को पुनः प्राचार्य के पद का प्रभार दे दिया गया है। विभाग के प्रमुख सचिव अनुपम राजन द्वारा दिए गए जांच आदेशों को दरकिनार करते हुए आयुक्त निशांत बरबड़े ने प्रोफेसर सरोज गुप्ता को न केवल प्राचार्य का प्रभार सौंपा, बल्कि उन्हें वित्तीय अधिकार भी दे दिए। यह निर्णय विभागीय पारदर्शिता और प्रशासनिक गंभीरता पर प्रश्नचिन्ह खड़ा करता है।

प्रोफेसर गुप्ता, जो सागर स्थित पं. दीनदयाल उपाध्याय शासकीय कला एवं वाणिज्य महाविद्यालय में हिन्दी प्राध्यापक हैं, को पहले भी गंभीर आर्थिक अनियमितताओं और भ्रष्टाचार के आरोपों के चलते प्राचार्य पद से हटाया गया था। उनके खिलाफ शासन के आरक्षण रोस्टर के उल्लंघन से लेकर जनभागीदारी फंड की अनियमित उपयोगिता तक कुल 13 बिंदुओं पर जांच हुई थी।

जांच में आरोपों की पुष्टि, फिर भी बहाली

प्रमुख सचिव अनुपम राजन ने मकरोनिया बुजुर्ग के प्राचार्य डॉ. एसी जैन की अध्यक्षता में एक जांच समिति गठित करवाई थी, जिसने विस्तृत जांच कर “आरोपों की पुष्टि संबंधी रिपोर्ट” विभाग को सौंप दी थी।

रिपोर्ट में यह पाया गया कि:

  • वरिष्ठता सूची में हेरफेर कर प्राचार्य पद हासिल किया गया।
  • जनभागीदारी फंड का गलत उपयोग कर सरकारी एफडी को तोड़ा गया और प्राइवेट बैंक में राशि डाली गई।
  • शासन के आरक्षण नियमों के खिलाफ जाकर नियुक्ति दी गई।
  • टेंडर प्रक्रिया को दरकिनार कर चहेते सप्लायर्स से ऊंची दरों पर खरीदी की गई।
  • निजी कार्यक्रमों में जनभागीदारी फंड का दुरुपयोग हुआ।

फिर से प्रभार सौंपने पर उठे सवाल

इन सभी पुष्ट आरोपों के बावजूद विभाग के ओएसडी संतोष भार्गव द्वारा आयुक्त के अनुमोदन से सरोज गुप्ता को फिर से उसी कॉलेज में प्राचार्य एवं आहरण-संवितरण अधिकारी का प्रभार सौंपने का आदेश जारी कर दिया गया। यह आदेश न केवल विभागीय अनुशासन की उपेक्षा दर्शाता है, बल्कि न्यायसंगत प्रक्रिया की अवहेलना भी प्रतीत होता है।

सबूत नष्ट करने की जताई जा रही आशंका

स्थानीय सूत्रों और विभागीय कर्मचारियों के अनुसार, सरोज गुप्ता ने प्रभार मिलते ही तेजी से पुराने दस्तावेजों और फाइलों की छंटाई शुरू कर दी है। आशंका जताई जा रही है कि जांच में सामने आए प्रमुख सबूतों को नष्ट किया जा रहा है और खरीद आदेशों को वैध ठहराने की कोशिशें भी शुरू हो गई हैं।

जनभागीदारी मद में जमा राशि को खर्च करने की गति तेज कर दी गई है, जो कि पूर्व कार्यकाल के दौरान अनियमितताओं से जुड़ी रही है। यह स्थिति विभाग की कार्यप्रणाली पर गंभीर प्रश्न उठाती है।

स्थानीय जनप्रतिनिधियों और कर्मचारियों में नाराजगी

प्रोफेसर गुप्ता की पुनर्बहाली के इस आदेश पर स्थानीय जनप्रतिनिधियों और महाविद्यालय के कर्मचारियों ने भी हैरानी और नाराजगी जताई है। प्रमुख सचिव स्तर से जांच कराए जाने के बावजूद आरोपी को फिर से उसी पद पर नियुक्त करने को विभागीय प्राथमिकताओं में गड़बड़ी बताया जा रहा है।

यह मामला न केवल विभागीय स्तर पर जवाबदेही की कमी को उजागर करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि कैसे जांच रिपोर्ट और साक्ष्यों को नजरअंदाज कर प्रशासनिक आदेशों को धता बताया जा सकता है। यदि अब भी शासन स्तर से हस्तक्षेप नहीं हुआ, तो यह प्रकरण शिक्षा संस्थानों में पारदर्शिता और जवाबदेही की नींव को कमजोर कर सकता है।