चंद्रकेतु मिश्रा, प्रयागराज। भारत की सभ्यता को यदि किसी एक सूत्र में बाँधा जाए तो वह है ‘प्रकृति के साथ सामंजस्य’। यही भावना वेदों में, शास्त्रों में और हमारी जीवनशैली में रची-बसी रही है। इसी परंपरा का जीवंत स्वरूप है आयुर्वेद—जो केवल औषधि पद्धति नहीं बल्कि संपूर्ण जीवन दर्शन है। आज, 23 सितंबर 2025 को भारत ने एक नया अध्याय लिखते हुए पहली बार आयुर्वेद दिवस निश्चित तिथि पर मनाया। अब हर वर्ष यह दिवस इसी तिथि पर मनाया जाएगा। यह केवल तिथि का परिवर्तन नहीं, बल्कि भारत की उस गहरी सोच का प्रतीक है जिसमें स्वास्थ्य, संस्कृति और विज्ञान को एक सूत्र में बाँधा गया है।
आयुर्वेद की वैदिक जड़ें
आयुर्वेद की नींव वेदों में पाई जाती है। अथर्ववेद को आयुर्वेद का आधार माना जाता है। इसमें रोगों की उत्पत्ति, निदान और औषधियों का उल्लेख है। ऋग्वेद और यजुर्वेद में भी जड़ी-बूटियों की महिमा का वर्णन मिलता है।चरक संहिता और सुश्रुत संहिता जैसे आयुर्वेदिक ग्रंथ चिकित्सा के ऐसे विश्वकोश हैं, जो आज भी प्रासंगिक हैं। चरक ने आयुर्वेद को आहार, निदान और औषधियों के संतुलन का विज्ञान बताया, जबकि सुश्रुत को शल्यचिकित्सा का जनक माना जाता है। यह उल्लेखनीय है कि प्लास्टिक सर्जरी और अंग प्रत्यारोपण जैसी तकनीकों का उल्लेख सुश्रुत संहिता में सहस्रों वर्ष पहले मिलता है।
शास्त्र से शास्त्रार्थ तक
भारतीय शास्त्र आयुर्वेद को केवल रोगनिवारण का साधन नहीं मानते, बल्कि दैनिक जीवन पद्धति बताते हैं। इसमें ‘दिनचर्या’ और ‘ऋतुचर्या’ का विस्तार मिलता है। उदाहरण के लिए, किस ऋतु में क्या खाना चाहिए, किस ऋतु में कौन-सी सावधानियाँ रखनी चाहिए—ये सभी नियम हजारों साल पहले लिख दिए गए। ध्यान देने वाली बात यह है कि यह सब अंधविश्वास नहीं, बल्कि प्रकृति के चक्र और मानव शरीर की अनुकूलता पर आधारित था। यही कारण है कि आयुर्वेद ‘समग्र चिकित्सा पद्धति’ के रूप में आज भी शास्त्रार्थ का विषय बना हुआ है।
विज्ञान और आयुर्वेद
आज विज्ञान जिस न्यूट्रिशन साइंस और प्रिवेंटिव मेडिसिन की बात करता है, उसका आधार आयुर्वेद में हजारों वर्ष पहले स्थापित किया गया था।आयुर्वेद ‘त्रिदोष सिद्धांत’ (वात, पित्त, कफ) पर आधारित है, जो आधुनिक शब्दों में बॉडी मेटाबॉलिज़्म और हार्मोनल संतुलन का ही रूप है। औषधीय पौधों के उपयोग पर आधारित हज़ारों नुस्ख़े आज की फाइटोथेरेपी और हर्बल मेडिसिन का आधार बन चुके हैं। नीम, अश्वगंधा, त्रिफला, तुलसी जैसी औषधियाँ अब अंतरराष्ट्रीय बाज़ार में बायोमेडिसिन के रूप में शोध का विषय हैं। यहाँ तक कि अमेरिका और यूरोप की कई यूनिवर्सिटीज़ ने आयुर्वेदिक हर्बल मेडिसिन पर रिसर्च सेंटर खोले हैं। यह इस बात का प्रमाण है कि आयुर्वेद केवल परंपरा नहीं, बल्कि वैज्ञानिक आधारों पर खड़ा ज्ञान है।
आयुर्वेद दिवस को वैश्विक स्तर पर स्थायी पहचान
अब तक आयुर्वेद दिवस धनतेरस (धन्वंतरि जयंती) पर मनाया जाता था। लेकिन यह तिथि हर साल बदलती थी। मार्च 2025 में भारत सरकार ने अधिसूचना जारी कर इसे स्थायी कर दिया। अब हर साल 23 सितंबर को ही आयुर्वेद दिवस मनाया जाएगा। यह निर्णय न केवल प्रशासनिक सुविधा के लिए लिया गया है, बल्कि इससे इस दिवस को वैश्विक स्तर पर भी एक स्थायी पहचान मिलेगी। दुनिया भर में स्वास्थ्य संबंधी दिन निश्चित तारीखों पर मनाए जाते हैं, जैसे 7 अप्रैल को विश्व स्वास्थ्य दिवस। उसी तर्ज़ पर आयुर्वेद दिवस भी अब वैश्विक कैलेंडर में स्थायी जगह पा गया है।
इस वर्ष की थीम विशेष महत्व रखती है—“Ayurveda for People & Planet” (लोगों और ग्रह के लिए आयुर्वेद)। यह संदेश देती है कि स्वास्थ्य केवल शरीर तक सीमित नहीं है। यदि हमारी पृथ्वी स्वस्थ रहेगी तो ही हम स्वस्थ रह पाएँगे। पर्यावरण संतुलन, स्वच्छ जल, शुद्ध वायु और जैव विविधता—ये सब आयुर्वेदिक जीवनशैली का अभिन्न हिस्सा हैं। औषधीय पौधों की सुरक्षा और खेती से लेकर प्रदूषण नियंत्रण तक, हर आयाम इस थीम से जुड़ता है। इस प्रकार आयुर्वेद दिवस केवल एक चिकित्सा पद्धति का उत्सव नहीं, बल्कि पारिस्थितिकी और मानव जीवन के संतुलन का भी प्रतीक बन गया है।
आधुनिक समाज में आयुर्वेद की प्रासंगिकता
आज की दुनिया जीवनशैली संबंधी बीमारियों से घिरी हुई है—मधुमेह, मोटापा, तनाव, उच्च रक्तचाप। आधुनिक चिकित्सा पद्धति इनके उपचार में सक्षम है, लेकिन रोकथाम में उतनी सफल नहीं। आयुर्वेद यहाँ पर आधुनिक जीवन के लिए निवारक उपाय देता है। योग और ध्यान को इसकी सहायक पद्धतियाँ माना गया है, जो मानसिक और शारीरिक स्वास्थ्य दोनों को संतुलित करती हैं। यही कारण है कि आयुर्वेद और योग आज इंटीग्रेटेड हेल्थ सिस्टम के तहत विश्व स्वास्थ्य संगठन (WHO) की प्राथमिकताओं में शामिल हैं।
वैश्विक स्वीकार्यता
संयुक्त राष्ट्र (UNO) और WHO आयुर्वेदिक चिकित्सा को ट्रेडिशनल मेडिसिन के रूप में मान्यता दे चुके हैं। चीन की तरह भारत भी अब अपनी परंपरागत चिकित्सा प्रणाली को वैश्विक बाज़ार में स्थापित कर रहा है।आयुष मंत्रालय और पर्यटन विभाग ने मिलकर मेडिकल टूरिज्म को बढ़ावा देने की योजनाएँ बनाई हैं, ताकि विदेशी नागरिक भारत आकर आयुर्वेदिक चिकित्सा का अनुभव ले सकें। यह न केवल स्वास्थ्य का विस्तार है बल्कि भारत की अर्थव्यवस्था और सांस्कृतिक पहचान के लिए भी महत्वपूर्ण कदम है।
आयुर्वेद दिवस केवल एक औपचारिकता नहीं है, बल्कि यह हमारी संस्कृति, विज्ञान और भविष्य की दिशा को एक साथ जोड़ने का अवसर है। वेदों की पंक्तियों से लेकर आधुनिक विज्ञान प्रयोगशालाओं तक, आयुर्वेद ने अपनी उपयोगिता साबित की है। आज जब हम 23 सितंबर को आयुर्वेद दिवस मना रहे हैं, तो यह केवल जड़ी-बूटियों का उत्सव नहीं, बल्कि जीवन जीने के उस संतुलित दृष्टिकोण का उत्सव है जो हमें बताता है— “स्वास्थ्य केवल रोग-मुक्ति नहीं, बल्कि शरीर, मन, आत्मा और प्रकृति का सामंजस्य है।”
भगवान धन्वंतरि से आप सभी के उत्तम स्वास्थ्य की कामना के साथ आयुर्वेद दिवस की हार्दिक शुभकामनाएं…
