इस्तीफे के बाद युवा आईएफएस का बड़ा खुलासा— कार्य योजना के अनुसार कभी नहीं मिला बजट, व्यवस्था को बताया अतार्किक और भ्रामक
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश कैडर के वर्ष 2013 बैच के तेज-तर्रार भारतीय वन सेवा (IFS) अधिकारी विपिन पटेल ने सेवा से इस्तीफा देने के बाद वन विभाग की वर्किंग प्लान प्रणाली और उसके क्रियान्वयन पर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि वर्किंग प्लान उन्हें अब ‘धोखा’ लगता है और जब उन्हें इस व्यवस्था की वास्तविकता और भ्रम का आत्मबोध हुआ, तभी उन्होंने सेवा को अलविदा कहने का निर्णय लिया।
वर्किंग प्लान ऑफिसर (WPO) के रूप में कार्य कर चुके विपिन पटेल ने मंगलवार सुबह सोशल मीडिया पर अपने अनुभव साझा करते हुए लिखा कि उन्हें वर्षों तक अतार्किक और भ्रामक व्यवस्थाओं में उलझाए रखा गया। उन्होंने इसे अपना “अंतिम संदेश” बताते हुए कहा कि वर्किंग प्लान को सबसे महत्वपूर्ण दस्तावेज माना जाता है, लेकिन जब उसी में तर्क नहीं दिखता, तो आगे की सेवा का भी कोई औचित्य नहीं बचता।
‘DFO रहते एक बार भी कार्य योजना के अनुसार बजट नहीं मिला’
पटेल ने लिखा कि DFO के रूप में अपने चार कार्यकालों में उन्हें एक बार भी बजट कार्य योजना के अनुसार आवंटित नहीं किया गया।
उन्होंने विकास शाखा पर सवाल उठाते हुए कहा कि—
— बजट आवंटन के लिए जिम्मेदार विकास विंग ने कहीं भी वर्किंग प्लान के अनुरूप बजट जारी नहीं किया,
— योजनाएं कागजों में बनी रहीं, लेकिन जमीन पर उनका पालन नहीं हुआ।
WPO पद की नीतियां बार-बार क्यों बदलीं?
आईएफएस अधिकारी ने वन मंत्रालय और विभाग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठाते हुए पूछा कि—
पहले DFO का कार्यकाल पूरा होने के बाद CF को WPO बनाया जाता था,
फिर सेवानिवृत्ति से पहले दो वर्ष शेष अधिकारियों को छूट दी गई,
बाद में 2010 बैच को छूट मिली,
और अंततः नीति बदलकर वरिष्ठतम DFO को ही कार्य योजना बनाने का अधिकार दे दिया गया।
पटेल का कहना है कि इन बदलावों के कारण WPO पद की गंभीरता खत्म हो गई और अधिकांश अधिकारी इस पद पर निष्क्रिय नजर आए।
अफसर बदलते ही बदलते रहे विकास के मॉडल
पटेल ने लिखा कि कार्य योजना के क्रियान्वयन में हर वरिष्ठ अधिकारी के साथ विकास मॉडल बदलते गए।
— पहले केवल 0.4 घनत्व से कम रिक्त वन क्षेत्रों पर काम हुआ,
— फिर पुष्कर सिंह के कार्यकाल में बड़ी भूमि की बाड़बंदी और एक-तिहाई क्षेत्र में वृक्षारोपण का मॉडल आया,
— बाद में चित्रंजन त्यागी के समय JFMC और माइक्रोप्लान आधारित मॉडल अपनाया गया,
— उनके जाने के बाद यह मॉडल भी छोड़ दिया गया,
— यू.के. सुबुद्धि के कार्यकाल में फिर पुराने RDF/वृक्षारोपण मॉडल पर वापसी हुई।
उन्होंने लिखा कि अलग-अलग दौर में अलग-अलग अवधारणाएं आईं, लेकिन ‘सबका साथ सबका विकास’ के नाम पर बजट आवंटन ही एकमात्र कसौटी बनी रही।
‘वर्किंग प्लान का असली मकसद सिर्फ वृक्षारोपण?’
पटेल ने सवाल उठाया कि यदि कार्य योजना का उद्देश्य केवल वृक्षारोपण की अनुमति देना ही है, तो—
— जब तक MOEF (पर्यावरण मंत्रालय) से स्वीकृति न मिले, वृक्षारोपण नहीं हो सकता,
— तो फिर कार्य योजना की स्वीकृति का तर्क क्या रह जाता है?
उन्होंने यह भी पूछा कि सामाजिक-आर्थिक सर्वेक्षण के लिए गांवों और ग्रिड बिंदुओं के चयन में FSI की भूमिका क्यों तय की जाती है।
‘वर्किंग प्लान से अधिकारी भागते रहे’
पटेल ने लिखा कि अधिकांश अधिकारी वर्किंग प्लान से बचने की कोशिश करते रहे और WPO पद की नीतियों में बदलाव कराते रहे। वहीं दूसरी ओर, इस पद को यह कहकर प्रचारित किया गया कि—
— यहीं से असली जंगल और वन विज्ञान का ज्ञान मिलता है,
— और यह अधिकारियों के लिए ‘आराम का समय’ भी माना जाता है।
उन्होंने सवाल उठाया कि मध्यप्रदेश और छत्तीसगढ़ को छोड़कर अन्य राज्यों में यह मुद्दा इतना गंभीर क्यों नहीं है और कई राज्य तो इस पर जोर ही नहीं देते।
‘चार कार्यकाल लगे सच्चाई समझने में’
आईएफएस अधिकारी ने लिखा कि उन्हें यह सच्चाई समझने में चार कार्यकाल लग गए, क्योंकि वे हमेशा लोगों और वरिष्ठों की बातों पर भरोसा करते रहे।
उन्होंने कहा—
“मेरा मन लोगों की कही बातों और मुझे दिखाई गई चीजों पर विश्वास करने के लिए तैयार था, लेकिन अब मुझे इसमें कोई तर्क नजर नहीं आता।”


