इंदौर के फर्जी बैंक गारंटी घोटाले से उजागर हुआ सच, ईडी की एंट्री से हड़कंप, सिर्फ इंदौर में 71 करोड़ का गबन
गणेश पाण्डेय, भोपाल। मध्यप्रदेश के शराब कारोबार से जुड़ा इंदौर का बहुचर्चित फर्जी बैंक गारंटी कांड अब नए खुलासों के कारण सुर्खियों में है। केंद्रीय प्रवर्तन निदेशालय (ईडी) की जांच के बाद यह सामने आया है कि ठेका घोटाले में करीब 71 करोड़ रुपए का गबन हुआ है। वहीं, प्रदेशभर में शराब ठेकेदारों से वाणिज्यकर विभाग की करीब 1309 करोड़ रुपए की राशि अब भी बकाया है, जिसकी वसूली को लेकर विभागीय अफसर उदासीन रवैया अपनाए हुए हैं।
इंदौर का ठेका घोटाला और ईडी की दखल
साल 2022–23 में इंदौर में शराब दुकान का ठेका फर्जी बैंक गारंटी और डीडी के सहारे हथियाने का मामला उजागर हुआ था। इस कांड में वेलवर्थ बेंगलुरू के मोहन कुमार राय और अनिल सिन्हा सहित विभागीय अफसर—डिप्टी कमिश्नर संजय तिवारी और असिस्टेंट कमिश्नर राजनारायण सोनी की भूमिका संदिग्ध पाई गई थी। मामले में एफआईआर तो दर्ज हुई, लेकिन कार्रवाई ठंडी पड़ गई। बाद में ईडी ने 2023 में जब रिपोर्ट तलब की, तब जाकर घोटाले की परतें खुलीं।
41 करोड़ से बढ़कर 71 करोड़ की गबन राशि
शुरुआती जांच में गबन की रकम 41 करोड़ 65 लाख रुपए बताई गई थी, मगर ईडी की सख्ती के बाद दोबारा आकलन में यह रकम बढ़कर 71 करोड़ 58 लाख रुपए हो गई। विभाग अब इस रकम की वसूली का दावा कर रहा है, लेकिन वित्तीय परीक्षण के नाम पर प्रक्रिया को खींचा जा रहा है।
प्रदेश में 1309 करोड़ बकाया
शराब और मादक पदार्थों से जुड़े कारोबार में प्रदेश सरकार की 1309 करोड़ रुपए की देनदारी फंसी हुई है। ठेकेदारों से वसूली में विभागीय अफसर गंभीरता नहीं दिखा रहे। कई मामलों में ठेकेदार अदालत से स्टे लेकर बच निकले, जबकि विभाग ने कानूनी लड़ाई तक नहीं लड़ी।
उदाहरण स्वरूप, 2020–21 में टीकमगढ़ में अल्सस इंडस्ट्रीज प्रा.लि. के दुष्यंत सिंह बुंदेला ने 13 करोड़ का ठेका लिया, लेकिन महज सवा तीन करोड़ रुपए ही जमा किए। शेष 10 करोड़ पर दिल्ली हाईकोर्ट से स्टे ले लिया गया, और विभाग उसे हटाने की कोशिश तक नहीं कर पाया।
वसूली ठप, डूबत खाते में डालने की सिफारिश
अनेक मामलों में अधिकारियों ने बकाया राशि को “राइट-ऑफ” यानी डूबत खाते में डालने की सिफारिश कर दी है। रीवा में 21 लाख की वसूली का मामला महज इसलिए अटका बताया गया क्योंकि ठेकेदार का ठिकाना नहीं मिल रहा। इसी तरह, 61 लाख की बकाया राशि पर यह तर्क दिया गया कि संबंधित ठेकेदार जेल में है, इसलिए वसूली संभव नहीं।
संभागवार बकायादारी
आबकारी विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, इंदौर संभाग में सबसे ज्यादा 689.64 करोड़ रुपए बकाया हैं। इसके बाद उज्जैन में 166.56 करोड़, रीवा में 159.72 करोड़, जबलपुर में 85.56 करोड़, सागर में 65.10 करोड़, भोपाल में 57.06 करोड़, ग्वालियर–चंबल में 43.42 करोड़ और नर्मदापुरम में 42.14 करोड़ रुपए बकाया हैं।
जिला स्तर पर बुरहानपुर 425 करोड़ की बकाया राशि के साथ शीर्ष पर है, जबकि इंदौर जिला 100 करोड़ रुपए की बकायादारी दर्ज करता है। केवल राजगढ़, सीहोर और हरदा ऐसे जिले हैं जहां किसी प्रकार का बकाया नहीं है।
अफसरों का रवैया लापरवाह
विभाग के प्रमुख सचिव अमित राठौर का कहना है—“15–20 हजार करोड़ के ठेकों में इतनी रिकवरी पेंडेंसी सामान्य है। कई मामले 10–15 साल पुराने हैं, कार्रवाई लगातार जारी है।” वहीं, भोपाल संभाग के उपायुक्त यशवंत कुमार धनोरा का कहना है कि “कई प्रकरण कोरोनाकाल के हैं और अदालत में विचाराधीन हैं। इसके बावजूद वसूली की कोशिशें जारी हैं।”
लेकिन जमीनी हकीकत यह है कि अरबों की बकाया रकम वर्षों से वसूली से बाहर है और शराब कारोबार में मिलीभगत और उदासीनता का काला सच बार-बार सामने आता रहा है।
